भारतीय प्रशासनिक सेवा के 2012 बैच के अधिकारी कन्नन गोपीनाथन एक बार फिर चर्चा में हैं उन्होंने 2019 में अपना इस्तीफा दिया था, लेकिन छह साल बाद भी उसे स्वीकार नहीं किया गया है इसी वजह से वे न तो नौकरी कर पा रहे हैं. और न ही चुनाव लड़ पा रहे हैं 9 अप्रैल को केरल में चुनाव होने हैं और उनकी इच्छा थी कि वे कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरें, लेकिन यह संभव नहीं हो सका इस मुद्दे पर उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए अपनी नाराजगी भी जताई है.

इस्तीफा और सरकार की कार्रवाई

कन्नन गोपीनाथन ने 21 अगस्त 2019 को इस्तीफा दिया था, उस समय वे दादरा और नगर हवेली में बिजली और गैर पारंपरिक ऊर्जा सचिव के पद पर तैनात थे उनका इस्तीफा जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने के बाद लगाए गए प्रतिबंधों के विरोध में था उन्होंने इसे मौलिक अधिकारों और बोलने की आजादी से जुड़ा मुद्दा बताया था इसके बाद सरकार ने उनके खिलाफ अनुशासनात्मक जांच शुरू कर दी, जिससे उनका इस्तीफा लंबित श्रेणी में चला गया इस स्थिति के कारण वे अब भी तकनीकी रूप से सेवा में माने जाते हैं.

उन्होंने सोशल मीडिया पर नरेंद्र मोदी को टैग करते हुए लिखा कि पिछले छह साल से उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया है उन्होंने कहा कि उन्हें न वेतन मिल रहा है और न ही सेवा से मुक्त किया जा रहा है, जिससे उनका पेशेवर जीवन आगे नहीं बढ़ पा रहा है उन्होंने इसे उत्पीड़न बताया और कहा कि यह उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने से रोक रहा है.

चुनाव लड़ने में अड़चन

कन्नन गोपीनाथन की इच्छा थी कि वे केरल से कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ें चर्चा थी कि वे पलक्कड़ सीट से मैदान में उतर सकते हैं, लेकिन इस्तीफा लंबित होने के कारण यह संभव नहीं हुआ चुनाव नियमों के अनुसार किसी भी सरकारी कर्मचारी को चुनाव लड़ने से पहले सेवा से पूरी तरह मुक्त होना जरूरी है चूंकि उनका इस्तीफा अभी तक स्वीकार नहीं हुआ है, इसलिए उन्हें सरकारी कर्मचारी माना जा रहा है और उनका नामांकन रद्द हो सकता था

रिटर्निंग ऑफिसर नामांकन की जांच के दौरान यह देखता है कि उम्मीदवार ने सरकारी पद से इस्तीफा दिया है और वह स्वीकार भी हो चुका है अगर इस्तीफा लंबित रहता है तो उम्मीदवार को लाभ के पद पर माना जाता है इसी कारण कन्नन चुनाव नहीं लड़ पाए और उनकी जगह यूडीएफ ने पलक्कड़ से अभिनेता रमेश पिशारोड़ी को उम्मीदवार बनाया

कन्नन गोपीनाथन का एक पुराना किस्सा भी काफी चर्चा में रहा है 2018 में जब केरल में भीषण बाढ़ आई थी, उस समय वे दादरा और नगर हवेली में कलेक्टर थे उन्होंने छुट्टी ली और बिना अपनी पहचान बताए केरल पहुंच गए वहां उन्होंने आम लोगों के साथ मिलकर राहत कार्यों में हिस्सा लिया वे तिरुवनंतपुरम और एर्नाकुलम के राहत केंद्रों में ट्रकों से सामग्री उतारते रहे और किसी को यह नहीं बताया कि वे एक आईएएस अधिकारी हैं करीब आठ दिन बाद एक अन्य अधिकारी ने उन्हें पहचान लिया, जिसके बाद यह बात सामने आई

उनके अनुसार उन्होंने लंबे समय तक अपने निजी मुद्दे को सार्वजनिक नहीं किया था, लेकिन इस्तीफा स्वीकार न होने के कारण उनकी स्थिति ऐसी हो गई है कि वे न तो कोई नया काम शुरू कर पा रहे हैं और न ही अपने करियर को आगे बढ़ा पा रहे हैं उन्होंने कहा कि अगर वे चुप रहना चाहते तो इस्तीफा देने की जरूरत ही नहीं होती