दिल्ली में कांग्रेस पार्टी के पुराने मुख्यालय 24 अकबर रोड को लेकर नया विवाद सामने आया है केंद्र सरकार ने पार्टी को इस परिसर को 28 मार्च तक खाली करने के लिए कहा है यह वही जगह है जहां से कांग्रेस ने दशकों तक अपनी राजनीतिक गतिविधियां चलाईं अब जबकि पार्टी अपना मुख्यालय पहले ही 9A कोटला मार्ग स्थित इंदिरा भवन में शिफ्ट कर चुकी है, तब भी पुराने दफ्तर को लेकर खींचतान जारी है इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक माहौल को एक बार फिर गर्म कर दिया है और कांग्रेस इस फैसले पर कानूनी रास्तों पर विचार कर रही है.
24 अकबर रोड पर विवाद
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पार्टी के दो कार्यालयों को नोटिस मिला है, जिनमें 24 अकबर रोड और यूथ कांग्रेस का कार्यालय शामिल है उन्होंने देश की मौजूदा प्राथमिकताओं का जिक्र करते हुए कहा कि आम जनता महंगाई, ईंधन की कमी और किसानों की समस्याओं से जूझ रही है उनके अनुसार ऐसे समय में इस तरह के कदम उठाना सवाल खड़े करता है.
उन्होंने यह भी कहा कि 1969 से यह कार्यालय पार्टी की पहचान रहा है और कई प्रधानमंत्रियों का इससे सीधा जुड़ाव रहा है उनका कहना था कि यह सिर्फ एक इमारत नहीं बल्कि एक विरासत है उन्होंने पुराने समय का हवाला देते हुए कहा कि जब कांग्रेस सत्ता में थी तब विपक्षी दलों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया गया खेड़ा ने भारतीय जनता पार्टी के कार्यालयों का भी जिक्र किया और कहा कि कई स्थानों पर उनके बड़े कार्यालय बने हुए हैं उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि इन कार्यालयों के निर्माण के लिए धन कहां से आता है इस बयान के बाद यह मामला और ज्यादा चर्चा में आ गया है.
मुख्यालय का लंबा इतिहास
कांग्रेस का यह मुख्यालय लंबे समय तक पार्टी की राजनीति का केंद्र रहा है साल 1978 में पार्टी का मुख्यालय 24 अकबर रोड पर शिफ्ट हुआ था इससे पहले कांग्रेस का दफ्तर अलग-अलग जगहों पर रहा 1970 के दशक में पार्टी का दफ्तर राजेंद्र प्रसाद रोड पर था, जिसका पता तीन रायसीना रोड था
1977 के चुनाव में हार के बाद कांग्रेस में विभाजन हुआ और इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले गुट को काम करने के लिए जगह की जरूरत पड़ी उस समय राज्यसभा सांसद जी वेंकट स्वामी ने अपना अकबर रोड स्थित बंगला उन्हें दिया यही बंगला आगे चलकर कांग्रेस का मुख्यालय बना यह वही दौर था जब कांग्रेस ने वापसी की और 1980 के चुनाव में सत्ता में लौटी 24 अकबर रोड का यह परिसर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पीवी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्रियों के राजनीतिक फैसलों का गवाह रहा
इस भवन का इतिहास इससे भी पुराना है कभी यह इंडियन एयरफोर्स के एक अधिकारी का घर था और बाद में इंटेलिजेंस ब्यूरो की राजनीतिक शाखा का कार्यालय भी रहा इसे वर्मा हाउस के नाम से भी जाना जाता था, जो नाम पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दिया थाइस बंगले से जुड़ी एक और कहानी है यहां म्यांमार की राजदूत डॉ. खिन काई रहती थीं, जो आंग सांग सू की मां थीं वह करीब 15 साल तक इस जगह पर रहीं और आंग सांग सू भी उनके साथ यहीं रहती थीं
इंदिरा भवन में शिफ्ट और नया विवाद
कांग्रेस ने अपना नया मुख्यालय इंदिरा भवन में 14 जनवरी 2025 को शिफ्ट किया इस भवन की नींव 2009 में मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ने रखी थी और इसके निर्माण पर 252 करोड़ रुपये खर्च हुए 46 साल बाद पार्टी ने अपना आधिकारिक पता बदला इसके बावजूद पार्टी ने 24 अकबर रोड को पूरी तरह खाली नहीं किया और वहां नेताओं की आवाजाही जारी रही सरकार ने इससे पहले 2015 में कांग्रेस को दिए गए चार बंगलों का आवंटन रद्द कर दिया था, जिनमें 24 अकबर रोड भी शामिल था अब नए नोटिस के बाद स्थिति बदलती नजर आ रही है रिपोर्ट्स के अनुसार कांग्रेस इस फैसले के खिलाफ अदालत का रुख कर सकती है पार्टी का आरोप है कि अन्य दलों के कुछ कार्यालयों को लेकर ऐसी सख्ती नहीं दिखाई गई
कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने इंदिरा भवन के उद्घाटन के समय कहा था कि 24 अकबर रोड से उनका भावनात्मक जुड़ाव हमेशा रहेगा यही वजह है कि इस जगह को छोड़ना पार्टी के लिए आसान नहीं है, अगर कांग्रेस के मुख्यालय की शुरुआत की बात करें तो यह इलाहाबाद के स्वराज भवन से शुरू हुई थी मोतीलाल नेहरू का घर लंबे समय तक पार्टी की गतिविधियों का केंद्र रहा बाद में आनंद भवन बनने के बाद स्वराज भवन को पार्टी मुख्यालय के रूप में इस्तेमाल किया गया
1947 में आजादी से पहले पार्टी का दफ्तर दिल्ली के जंतर मंतर रोड पर शिफ्ट हुआ वहीं से देश के बंटवारे जैसे अहम फैसलों पर चर्चा हुई इसके बाद समय के साथ मुख्यालय कई बार बदला और आखिरकार 1978 में 24 अकबर रोड स्थायी केंद्र बन गया अब 2025 में इंदिरा भवन में शिफ्ट होने के बाद भी पुराने कार्यालय को लेकर विवाद जारी है यह मामला आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है, क्योंकि इसमें राजनीतिक और कानूनी दोनों पहलू जुड़े हुए हैं.