ईरान के साथ चल रहे युद्ध के बीच अमेरिका और NATO सहयोगियों के रिश्तों में तनाव अब खुलकर सामने आ गया है. इटली और स्पेन जैसे देशों ने अमेरिकी सैन्य अभियानों में सहयोग देने से इनकार कर दिया है. इस घटनाक्रम के बाद अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने साफ कहा है कि युद्ध खत्म होने के बाद NATO के साथ रिश्तों की समीक्षा करनी होगी ,यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका पहले से ही सहयोगियों पर रक्षा खर्च बढ़ाने का दबाव डालता रहा है, और अब ईरान संकट ने इन मतभेदों को और तेज कर दिया है, ट्रंप प्रशासन की नीति और सहयोगियों की प्रतिक्रिया ने इस पूरे मुद्दे को और गंभीर बना दिया है.
यूरोपीय देशों का इनकार
28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू हुई. इसके बाद हालात तेजी से बदले और ईरान ने जवाबी कदम उठाते हुए होर्मुज स्ट्रेट पर हमले किए, जिससे तेल टैंकरों की आवाजाही रुक गई. इस स्थिति से निपटने के लिए अमेरिका ने NATO सहयोगियों से मदद मांगी और उनसे युद्धपोत भेजने की अपील की ताकि इस समुद्री रास्ते को फिर से खोला जा सके
कई देशों ने इस मांग को सीधे तौर पर ठुकरा दिया, जबकि कुछ ने स्पष्ट जवाब नहीं दिया. इसी दौरान एक अहम घटना सामने आई जब इटली ने मध्य पूर्व जा रहे एक अमेरिकी सैन्य विमान को अपने यहां उतरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया. इसके एक दिन पहले स्पेन ने अमेरिकी विमानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र बंद कर दिया था. इन दोनों फैसलों ने अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच चल रहे मतभेद को साफ कर दिया. इससे यह भी दिखा कि यूरोप इस संघर्ष में सीधे शामिल होने से बचना चाहता है और अपने स्तर पर दूरी बनाए रखना चाहता है.
अमेरिका की कड़ी प्रतिक्रिया
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी नाराजगी जाहिर की. उन्होंने कहा कि ईरान के साथ संघर्ष खत्म होने के बाद अमेरिका को NATO के साथ अपने संबंधों पर दोबारा विचार करना होगा उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर अमेरिका अपने हितों की रक्षा के लिए सहयोगी देशों के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल नहीं कर सकता तो इस गठबंधन का महत्व कम हो जाता है. उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका अपने सहयोगियों से ईरान पर हमला करने की मांग नहीं कर रहा है, बल्कि केवल सैन्य ठिकानों के उपयोग की अनुमति चाहता है.
जब इस पर भी इनकार मिलता है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अमेरिका NATO में क्यों बना हुआ है. रुबियो ने यह भी स्पष्ट किया कि इस विषय पर अंतिम फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ही होगा. उनके बयान से यह साफ संकेत मिला कि अमेरिका इस मुद्दे को गंभीरता से देख रहा है और आगे इस पर सख्त रुख अपना सकता है.
ट्रंप और NATO पर बढ़ते सवाल
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले भी कई बार NATO को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं. उनका कहना रहा है कि यूरोपीय देश रक्षा खर्च कम करते हैं और इसका बोझ अमेरिका पर डालते हैं. उन्होंने कई मौकों पर यह भी कहा है कि अमेरिका हमेशा अपने सहयोगियों की सुरक्षा करता है लेकिन बदले में उसे उतना सहयोग नहीं मिलता. हाल ही में उन्होंने सहयोगी देशों की आलोचना करते हुए कहा कि अगर वे इस तरह का रवैया अपनाते रहेंगे तो NATO का भविष्य प्रभावित हो सकता है.
उन्होंने कुछ देशों को निशाना बनाते हुए कड़े शब्दों का इस्तेमाल भी किया. इस पूरे घटनाक्रम के बाद NATO के Article 5 को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं, जिसमें कहा गया है कि एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा. मौजूदा हालात में यह सवाल सामने आ रहा है कि क्या सभी सदस्य देश इस सिद्धांत पर पहले की तरह कायम हैं या नहीं यूरोप में इस बात को लेकर चिंता बढ़ रही है कि अगर अमेरिका ने दूरी बना ली तो सुरक्षा व्यवस्था पर असर पड़ सकता है. वहीं अमेरिका की ओर से लगातार दिए जा रहे बयानों ने यह संकेत दिया है कि मौजूदा हालात में यह गठबंधन पहले जैसा मजबूत नहीं रह गया है और इसके भीतर मतभेद अब साफ तौर पर दिखने लगे हैं.